नागपुर: ललित लांजेवार:
देश के पोल्ट्री उद्योग के सामने बार-बार उत्पन्न हो रही मक्के की कमी, पशु आहार के कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता और बढ़ती उत्पादन लागत जैसे गंभीर मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए Poultry Federation of India (PFI) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन के अध्यक्ष रणपाल धांडा ने 29 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत 12 पन्नों के ज्ञापन के माध्यम से देश में मक्का, सोयाबीन मील और अन्य महत्वपूर्ण फीड सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालीन राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
इस ज्ञापन के माध्यम से पोल्ट्री उद्योग के सामने एक महत्वपूर्ण नीतिगत सवाल खड़ा होता है—ऊर्जा क्षेत्र में इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग और अंडा-मांस उत्पादन के लिए आवश्यक पोल्ट्री फीड की उपलब्धता के बीच उचित संतुलन कैसे बनाए रखा जाए?
यह मुद्दा केवल फीड कंपनियों या इथेनॉल कारखानों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध लाखों पोल्ट्री व्यवसायियों के आर्थिक गणित, मक्का उत्पादक किसानों की आय, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आम उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर अंडे और चिकन उपलब्ध कराने से है।
1. इथेनॉल के लिए मक्के की मांग और पोल्ट्री उद्योग की चिंता:
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति को ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। अनाज से इथेनॉल उत्पादन होने के कारण कृषि उत्पादों के लिए औद्योगिक बाजार भी तैयार होता है।
लेकिन मक्का केवल इथेनॉल उद्योग का कच्चा माल नहीं है। यह पोल्ट्री फीड का प्रमुख ऊर्जा स्रोत है। मुर्गियों की वृद्धि, फीड सेवन, उत्पादन क्षमता और कुल उत्पादन लागत में मक्के की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार सोयाबीन मील प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
ऐसी स्थिति में मक्के की उपलब्धता का पर्याप्त आकलन किए बिना औद्योगिक उपयोग के लिए अतिरिक्त मांग पैदा होने पर पोल्ट्री फीड की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ने लगा है, ऐसी चिंता PFI ने व्यक्त की है।
संगठन ने स्पष्ट किया है कि इथेनॉल कार्यक्रम का विरोध करना इस ज्ञापन का उद्देश्य नहीं है। बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और पोल्ट्री क्षेत्र की फीड सुरक्षा, दोनों को ध्यान में रखते हुए अनाज के उपयोग को लेकर पारदर्शी नीति तैयार की जाए, यही प्रमुख मांग है।
2. पोल्ट्री फार्मर्स के मुनाफे पर इसका वास्तविक प्रभाव क्या हो सकता है?
पोल्ट्री व्यवसाय में फीड की लागत कुल उत्पादन खर्च का एक प्रमुख हिस्सा होती है। इसलिए फीड की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर किसानों के आर्थिक गणित पर पड़ता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी पोल्ट्री फार्म को 10 टन यानी 10,000 किलो फीड की आवश्यकता होती है, तो फीड की कीमत में प्रति किलो ₹1 की वृद्धि होने पर कुल फीड खर्च में ₹10,000 की बढ़ोतरी होगी। यदि कीमत में प्रति किलो ₹2 की वृद्धि होती है, तो यह अतिरिक्त खर्च ₹20,000 हो जाएगा। यह केवल खर्च समझाने के लिए दिया गया उदाहरण है; इसे वर्तमान बाजार कीमतों में वास्तविक वृद्धि का दावा नहीं माना जाना चाहिए।
इसी दौरान यदि बाजार में चिकन की बिक्री कीमत अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ती या पक्षियों की वृद्धि, फीड सेवन और मृत्यु दर के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है, तो फार्मर के मुनाफे पर और अधिक दबाव पड़ता है।
महंगा फीड, अधिक उत्पादन लागत और अनिश्चित बिक्री दर जैसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर किसानों की कार्यशील पूंजी की आवश्यकता बढ़ जाती है। कर्ज की किस्तें, मजदूरी, बिजली, दवाइयां, लिटर, परिवहन और अन्य खर्चों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
PFI ने अपने ज्ञापन में इसी आर्थिक श्रृंखला को लेकर चिंता व्यक्त की है। फीड महंगा होने से पोल्ट्री उत्पादकों को आर्थिक नुकसान हो सकता है और इसका प्रभाव हैचरी, फीड मिल, ट्रांसपोर्टर, पशु चिकित्सा सेवाओं, उपकरण आपूर्तिकर्ताओं और पोल्ट्री प्रोसेसिंग उद्योग पर भी पड़ सकता है।
3. मंडी में मक्के की कीमत और वास्तविक खरीद लागत के बीच अंतर:
इस ज्ञापन का एक महत्वपूर्ण मुद्दा सरकारी मंडी रिपोर्ट में दर्ज कीमतों और वास्तविक खरीदारों को मक्का खरीदने के लिए चुकानी पड़ने वाली लागत के बीच का अंतर है।
PFI ने उद्योग से जुड़े विभिन्न घटकों से प्राप्त जानकारी के आधार पर बताया है कि वास्तविक बाजार में खरीद लागत आधिकारिक मंडी कीमतों से लगभग 20 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकती है। संगठन ने इस अंतर की स्वतंत्र जांच करने की मांग भी की है।
मंडी की कीमत और फीड मिल तक पहुंचने वाले मक्के की अंतिम लागत अलग-अलग हो सकती है। क्योंकि इसमें व्यापारियों का मार्जिन, परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग, भंडारण, सुखाने, गुणवत्ता के अनुसार समायोजन और वित्तपोषण की लागत शामिल होती है।
इसलिए केवल मंडी की कीमतों को देखकर फीड उत्पादकों को वास्तव में कितनी लागत का सामना करना पड़ रहा है, इसकी पूरी तस्वीर सामने आना जरूरी नहीं है।
ऐसी व्यवस्था लागू होने पर मक्के की कीमतों में वृद्धि के वास्तविक कारणों को समझना और नीतिगत निर्णय लेना अधिक आसान हो सकता है।
4. मक्के का स्टॉक, जमाखोरी और बाजार में पारदर्शिता का मुद्दा:
PFI ने बड़े व्यापारियों और भंडारणकर्ताओं के पास उपलब्ध मक्के के स्टॉक की जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं होने को लेकर चिंता व्यक्त की है।
संगठन के अनुसार, बड़े पैमाने पर स्टॉक, खरीद-बिक्री और एक बाजार से दूसरे बाजार तक अनाज के परिवहन की पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होने पर वास्तविक कमी और कृत्रिम कमी के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि, प्रत्येक बड़े स्टॉक को जमाखोरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कृषि उत्पादों का भंडारण और व्यापार बाजार व्यवस्था के आवश्यक हिस्से हैं। इसलिए किसी भी तरह की अनियमितता का निष्कर्ष निकालने से पहले स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
इसके लिए संगठन ने डिजिटल ग्रेन स्टॉक एंड ट्रेड डिस्क्लोजर सिस्टम शुरू करने की मांग की है। इसमें बड़े व्यापारियों से दैनिक स्टॉक, खरीद, बिक्री और अनाज की आवाजाही का रिकॉर्ड लेना तथा मंडियों में आवक और कीमतों का सार्वजनिक डैशबोर्ड उपलब्ध कराना शामिल है।
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार यदि स्टॉक छिपाने, मिलीभगत से कीमतें तय करने या कृत्रिम कमी पैदा करने की बात साबित होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश भी ज्ञापन में की गई है।
5. इथेनॉल उत्पादन पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि अनाज आवंटन के लिए स्पष्ट नियमों की मांग:
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इथेनॉल उद्योग और पोल्ट्री उद्योग के बीच संघर्ष पैदा करना PFI का उद्देश्य नहीं है।
इथेनॉल उत्पादन से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, पोल्ट्री उद्योग को अंडे और चिकन का उत्पादन जारी रखने के लिए नियमित और उचित कीमतों पर फीड उपलब्ध होना आवश्यक है।
इसीलिए PFI ने अतिरिक्त अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन क्षमता को मंजूरी देने से पहले राष्ट्रीय फीड सुरक्षा का आकलन करने की मांग की है।
अनाज का उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक, पोल्ट्री और पशुधन क्षेत्र की मांग, खाद्यान्न की जरूरतें, संभावित बाजार कीमतें और वैकल्पिक कच्चे माल की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए अनाज आवंटन के पारदर्शी नियम तैयार करने का सुझाव दिया गया है।
यदि स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ों में फीड की गंभीर कमी साबित होती है, तो इथेनॉल के लिए होने वाले अतिरिक्त या वैकल्पिक अनाज उपयोग पर अस्थायी और आनुपातिक प्रतिबंध लगाने का विकल्प भी ज्ञापन में प्रस्तुत किया गया है।
इसका अर्थ सभी इथेनॉल कारखानों पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं है। बल्कि वास्तविक उपलब्धता, आवश्यकता और निर्धारित मानदंडों के आधार पर अनाज के उपयोग को नियंत्रित करने की बात कही गई है।
6. क्या DDGS से फीड की समस्या हल हो सकती है?
अनाज से इथेनॉल तैयार करने के दौरान DDGS (Distillers Dried Grains with Solubles) नामक उप-उत्पाद प्राप्त होता है। इसके पोषण मूल्य और गुणवत्ता के मानकों के अनुसार इसका उपयोग पशु आहार या पोल्ट्री फीड में किया जा सकता है।
हालांकि, DDGS उपलब्ध होने मात्र से मक्के या अन्य कच्चे माल की कमी अपने आप दूर हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं है।
इसकी पोषण संरचना, प्रोटीन, ऊर्जा, पाचन क्षमता, गुणवत्ता, कीमत, परिवहन और फीड फॉर्मूलेशन में उचित उपयोग जैसे पहलू महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक प्रकार के DDGS का उपयोग किसी भी मात्रा में या हर तरह के फीड में नहीं किया जा सकता।
PFI ने DDGS के व्यावसायिक उपयोग को बढ़ाने पर विचार करते समय उसकी गुणवत्ता, घरेलू मांग, निर्यात की संभावनाओं और वास्तविक खरीदारों की क्षमता का व्यावहारिक मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
इसलिए फीड उत्पादकों के लिए वैकल्पिक कच्चे माल का उपयोग एक समाधान हो सकता है, लेकिन इसका उपयोग वैज्ञानिक पोषण मानकों, गुणवत्ता नियंत्रण और आर्थिक व्यवहार्यता के आधार पर ही करना होगा।
7. मक्का उत्पादक किसानों का हित भी महत्वपूर्ण:
मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग के कारण मक्का उत्पादक किसानों को कुछ समय के लिए बेहतर बाजार भाव मिलने की संभावना रहती है। लेकिन दूसरी ओर, मक्के की बढ़ती लागत के कारण यदि पोल्ट्री उद्योग का उत्पादन कम होता है, तो भविष्य में फीड क्षेत्र की ओर से होने वाली मांग भी कम हो सकती है।
अचानक आयात बढ़ने, औद्योगिक मांग में बदलाव या अनाज आवंटन की नीति में अनिश्चितता पैदा होने से मक्का उत्पादक किसानों को भी कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए यह मुद्दा केवल पोल्ट्री फार्मर्स की लागत का नहीं, बल्कि पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला की स्थिरता का है।
PFI ने आवश्यकता पड़ने पर आयात का विकल्प खुला रखने का विरोध नहीं किया है। हालांकि, आयात की मात्रा और समय तय करते समय घरेलू उत्पादन, मंडियों में आवक, क्षेत्रीय कमी, बंदरगाहों पर उपलब्धता, अंतरराष्ट्रीय कीमतों और भारतीय किसानों के हितों को ध्यान में रखने की मांग की है।
8. गुणवत्तापूर्ण मक्का बीजों की उपलब्धता पर जोर:
देश में मक्के का उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की पर्याप्त उपलब्धता आवश्यक है। PFI ने अपने ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया है।
कृषि विश्वविद्यालयों की जमीन, अनुसंधान सुविधाओं और तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग गुणवत्तापूर्ण मक्का बीजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जा सकता है, ऐसा सुझाव दिया गया है।
इसके लिए कृषि विश्वविद्यालयों, बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं, अनुसंधान केंद्रों और किसानों के बीच समन्वय स्थापित करने की सिफारिश की गई है।
इसके अलावा बेहतर बीज, उन्नत कृषि पद्धतियां, सिंचाई की दक्षता, वैज्ञानिक भंडारण, परिवहन व्यवस्था और फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने पर जोर देने की आवश्यकता व्यक्त की गई है।
मक्के का उत्पादन बढ़ाना और उपलब्ध अनाज के नुकसान को कम करना दीर्घकालीन समाधान साबित हो सकते हैं।
9. अगले 5 से 10 वर्षों के लिए राष्ट्रीय फीड सुरक्षा कार्ययोजना:
मक्के की कमी की समस्या बार-बार सामने आने के कारण हर बार अस्थायी उपाय करने के बजाय अगले 5, 7 और 10 वर्षों की मांग का अनुमान लगाने वाली राष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने की मांग की गई है।
इसके लिए केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों, राज्य सरकारों, कृषि बाजार नियामकों, अनुसंधान संस्थानों, मक्का उत्पादकों, फीड उत्पादकों, पोल्ट्री उद्योग और इथेनॉल उद्योग को शामिल करते हुए राष्ट्रीय टास्क फोर्स गठित करने का प्रस्ताव है।
ज्ञापन में कहा गया है कि इस व्यवस्था के माध्यम से मक्का और सोयाबीन मील की भविष्य की आवश्यकता, पोल्ट्री और अन्य पशुधन क्षेत्रों की वृद्धि, औद्योगिक अनाज उपयोग, मौसमी उत्पादन, संभावित आयात और मौसम के कारण उत्पन्न होने वाले जोखिमों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही किन परिस्थितियों में केवल बाजार की निगरानी करनी है, कब आयात या परिवहन संबंधी उपाय करने हैं और किन परिस्थितियों में इथेनॉल के लिए अनाज के उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंधों पर विचार करना है, इसके लिए पहले से निर्धारित वस्तुनिष्ठ मानदंड होने चाहिए।
10. सरकार के सामने 30, 60 और 90 दिनों की कार्ययोजना:
PFI ने इस समस्या पर केवल चर्चा करने के बजाय समयबद्ध कार्रवाई का प्रस्ताव रखा है।
पहले 30 दिनों में: अंतर-मंत्रालयी टास्क फोर्स का गठन करना, मक्के की उपलब्धता और प्रमुख खाद्य घटकों के स्टॉक का प्रारंभिक आकलन करना, कमी वाले क्षेत्रों की पहचान करना और बड़े व्यापारियों के स्टॉक रिकॉर्ड की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करना।
पहले 60 दिनों में: बड़े व्यापारियों के लिए अंतरिम रिपोर्टिंग व्यवस्था शुरू करना, आवक-उपलब्धता-कीमतों से संबंधित संयुक्त फीड मार्केट बुलेटिन प्रकाशित करना और आवश्यकता पड़ने पर परिवहन या आनुपातिक आयात के विकल्प तैयार करना।
पहले 90 दिनों में: देश की फीड सुरक्षा का पहला मूल्यांकन प्रस्तुत करना, अगले 5, 7 और 10 वर्षों की मांग का अनुमान तैयार करना और कमी पैदा होने से पहले हस्तक्षेप करने के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित करना।
अगले 12 महीनों में: डिजिटल बाजार सूचना मंच को कार्यान्वित करना, नियमित समीक्षा व्यवस्था स्थापित करना और वार्षिक राष्ट्रीय फीड सुरक्षा रिपोर्ट प्रकाशित करना।
11. पोल्ट्री फार्मर्स के लिए इन मांगों का क्या महत्व है?
पोल्ट्री फार्मर्स की दृष्टि से इस ज्ञापन की प्रमुख अपेक्षाएं निम्नलिखित हैं:
मक्के की उपलब्धता और वास्तविक खरीद लागत की अधिक सटीक जानकारी मिलना।फीड के कच्चे माल में कमी का समय रहते अनुमान लगना।अनाज के औद्योगिक उपयोग को लेकर पारदर्शी नियम तैयार होना।
मक्का उत्पादन, भंडारण और परिवहन की समस्याओं को कम करना।
वैकल्पिक फीड सामग्री का वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से उचित उपयोग बढ़ाना।
अंडे और चिकन की उत्पादन लागत को प्रभावित करने वाले कारकों पर नीतिगत विचार होना।हालांकि, इन मांगों को स्वीकार कर लिए जाने के बावजूद फीड की कीमतें तुरंत कम हो जाएंगी, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। मक्के का वास्तविक उत्पादन, सोयाबीन मील की कीमतें, परिवहन लागत, अन्य कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादन क्षमता और बाजार में अंडे-चिकन की कीमतें भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहेंगी।
12. आगे के फैसलों पर पूरे पोल्ट्री उद्योग की नजर:
Poultry Federation of India ने प्रधानमंत्री कार्यालय से इस मुद्दे पर तत्काल संज्ञान लेने का अनुरोध किया है। साथ ही संबंधित मंत्रालयों को समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश देने की मांग की है। इसके अलावा, इस कार्य के लिए समन्वय अधिकारी नियुक्त कर संगठन के साथ चर्चा करने की भी तैयारी दिखाई है।
इस ज्ञापन से एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है—भारत की कृषि और ऊर्जा नीति में खाद्य सुरक्षा, पशु आहार, इथेनॉल, किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार जैसे विषयों पर अलग-अलग नहीं, बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण से विचार करना आवश्यक है।
इथेनॉल उद्योग का विकास और पोल्ट्री उद्योग की आर्थिक स्थिरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। लेकिन इसके लिए अनाज की उपलब्धता, वास्तविक स्टॉक, औद्योगिक उपयोग और भविष्य की मांग के संबंध में विश्वसनीय जानकारी और स्पष्ट नीति आवश्यक है।
पोल्ट्री फार्मर्स के सामने असली सवाल केवल मक्का महंगा होने का नहीं है, बल्कि यह है कि भविष्य में पर्याप्त मात्रा में और उचित कीमत पर फीड उपलब्ध रहेगा या नहीं?
यदि सरकार समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान देती है, तो पोल्ट्री फार्मर्स को उत्पादन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है, मक्का उत्पादक किसानों के हितों की रक्षा की जा सकती है और उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर अंडे और चिकन उपलब्ध कराने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
इस वक्त पोल्ट्री फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की कोर टीम, श्री रणपाल ढांडा, प्रेसिडेंट, श्री संजीव गुप्ता, वाइस प्रेसिडेंट (HQ),श्री रिकी थापर, जॉइंट सेक्रेटरी, श्री विजय सरदाना, एडवाइज़र, PFI के साथ PFI ऑफ़िस मैनेजर श्री जगदीश और श्री ऋतिक ने डॉ. मुथुकुमारसामी बी (IAS) जॉइंट सेक्रेटरी, डॉ. एसके दत्ता, जॉइंट कमिश्नर, डॉ. एचआर खन्ना, जॉइंट कमिश्नर, डॉ. सुजीत नायक, जॉइंट कमिश्नर, डॉ. लिपि सायरीवाल, डिप्टी कमिश्नर और भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग के दूसरे सीनियर अधिकारि उपस्थित थे,
अब इस ज्ञापन पर केंद्र सरकार क्या रुख अपनाती है और राष्ट्रीय फीड सुरक्षा के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाते हैं, इस पर देश के पूरे पोल्ट्री उद्योग की नजरें टिकी हुई हैं।

0 Comments