ललित लांजेवार,नागपूर :
भारतीय पोल्ट्री, पशु आहार और पशुपालन इंडस्ट्री पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है, और पिछले कुछ हफ़्तों में सोयाबीन मील (DOC) की कीमतों में बढ़ोतरी से पूरी फीड इंडस्ट्री परेशान है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर सरकार ने तुरंत दखल नहीं दिया, तो अगले कुछ महीनों में पोल्ट्री इंडस्ट्री को गंभीर फाइनेंशियल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
एक महीने में 35 परसेंट से ज़्यादा कीमत में बढ़ोतरी: बढ़ोतरी 40 परसेंट की दहलीज़ पर 8 अप्रैल, 2026 से 8 मई, 2026 तक सोयाबीन मील (DOC) की कीमत लगभग ₹52 से ₹55 प्रति किलो से सीधे ₹70 हो गई। इसमें एक महीने में 35 परसेंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, और डर है कि यह बढ़ोतरी 40 परसेंट की ओर बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीओसी के दाम में भारी बढ़ोतरी हुई है,
यह 0.59 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम से बढ़कर 0.74 अमेरिकी डॉलर हो गया है। इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार में दाम 25 फीसदी से ज्यादा बढ़ गए हैं। सोया डीओसी के साथ-साथ अन्य प्रोटीन युक्त कच्चे माल, मक्का, डी-ऑइल राइस ब्रान (डीओआरबी) और अन्य फीड सामग्री के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। इससे फीड निर्माता कंपनियों और पोल्ट्री किसानों का वित्तीय हिसाब-किताब गड़बड़ाने लगा है।
तीन साल का उच्चतम स्तर: सोयाबीन बाजार में अभूतपूर्व तेजी भारतीय सोयाबीन बाजार में पिछले 36 महीनों में सबसे ज्यादा तेजी देखी जा रही है। प्रमुख बाजारों में सोयाबीन के दाम ₹6500 से ₹7500 प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। राजस्थान के लातूर और कोटा क्षेत्रों में मिल डिलीवरी रेट ₹7500 प्रति क्विंटल हो गया है, जिससे व्यापारियों और फीड उद्योग में चिंता का माहौल है। आने वाले समय में कीमतें और बढ़ने की आशंका के चलते मार्केट में जमाखोरी और अस्थिरता की बात हो रही है। ज़्यादा डिमांड और लिमिटेड सप्लाई के कारण मार्केट लगातार ऊपर जा रहा है।
कीमतें बढ़ने के मुख्य कारण हैं:
1) घरेलू प्रोडक्शन में कमी: सरकार का अनुमान है कि 2025-26 सीज़न में भारत का सोयाबीन प्रोडक्शन 15.26 मिलियन टन से घटकर 12.72 मिलियन टन रह जाएगा। इंडस्ट्री एसोसिएशन के अनुसार, यह प्रोडक्शन घटकर 11 मिलियन टन रह सकता है।
2) कम उपलब्धता और सीमित आवक: मार्केट में सोयाबीन की उपलब्धता कम हो गई है और आवक भी सीमित है। इस वजह से कीमतों को काफी सपोर्ट मिल रहा है।
3) DOC की बढ़ती डिमांड: पोल्ट्री, डेयरी, फिशरीज़ और एनिमल फीड इंडस्ट्री में DOC की डिमांड काफी बढ़ गई है। एक्सपोर्ट डिमांड भी मज़बूत बनी हुई है, जिससे सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव बना है।
4) बढ़ी हुई स्पेक्युलेटिव खरीदारी: कीमतें और बढ़ने की संभावना के कारण ट्रेडर्स बड़ी मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं, जिससे मार्केट में उतार-चढ़ाव बढ़ रहा है। पोल्ट्री इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी पोल्ट्री इंडस्ट्री में फीड की लागत कुल प्रोडक्शन लागत का 65 से 70 प्रतिशत होती है।
चूंकि सोया DOC इसमें प्रोटीन का मुख्य सोर्स है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर अंडा, चिकन, पशु आहार और एक्वाकल्चर इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। छोटे और मीडियम पोल्ट्री प्रोड्यूसर पहले से ही कम प्रॉफिट मार्जिन पर काम कर रहे हैं, ऐसे में यह बढ़ोतरी उन्हें फाइनेंशियल संकट के कगार पर ला सकती है।
जैसे-जैसे GM सोयाबीन मील के इंपोर्ट की मांग गंभीर होती जा रही है, नेशनल और स्टेट लेवल के पोल्ट्री एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से 1.5 मिलियन मीट्रिक टन GM सोयाबीन मील इंपोर्ट करने की तुरंत परमिशन मांगी है। इंडस्ट्री का कहना है कि नई फसल के मार्केट में आने में अभी करीब पांच महीने बाकी हैं। अगर इस दौरान सही कदम नहीं उठाए गए, तो फीड सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
खास बात यह है कि 2021 में भी सरकार ने 1.2 मिलियन मीट्रिक टन GM सोयाबीन मील के इंपोर्ट को मंजूरी दी थी। उस समय इससे फीड मार्केट को स्टेबल करने में मदद मिली थी। सोपा का विरोध दूसरी ओर, सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन (सोपा) ने आयात का विरोध किया है। संगठन के अनुसार, घरेलू स्टॉक पर्याप्त है, और यदि आयात किया जाता है, तो स्थानीय किसानों को कम कीमत मिलने की संभावना है।
हालांकि, पोल्ट्री उद्योग के लिए सवाल स्पष्ट है - यदि चारा उपलब्ध नहीं होगा तो पोल्ट्री उद्योग कैसे जीवित रहेगा? सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती अब सरकार के सामने किसानों, प्रसंस्करण उद्योगों, पोल्ट्री क्षेत्र और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन बनाए रखते हुए तत्काल निर्णय लेने की बड़ी चुनौती है।
अन्यथा, आने वाले दिनों में अंडे और चिकन की कीमतों में वृद्धि, चारे की कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़े असर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह केवल कमोडिटी बाजार में उतार-चढ़ाव का मामला नहीं है, बल्कि देश की प्रोटीन आधारित खाद्य श्रृंखला और पशु चारा सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन गया है।
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