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वैश्विक युद्ध का भारतीय पोल्ट्री उद्योग पर दोहरा प्रहार; फीड की लागत बढ़ी, अंडों के दामों में भारी गिरावट

नागपुर/ललित लांजेवार:
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और व्यापार पर गहरा असर पड़ रहा है। इसके झटके अब भारतीय पोल्ट्री उद्योग में भी तीव्रता से महसूस किए जा रहे हैं। इस युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित हुई है, जिसका सीधा असर भारत में फीड की लागत और अंडों के बाजार भाव पर दिखाई दे रहा है। 
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फीड लागत में बड़ी वृद्धि – अमीनो एसिड्स बने मुख्य कारण
वर्तमान में पोल्ट्री उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमीनो एसिड्स (Amino Acids) और फीड सप्लीमेंट्स की बढ़ती कीमतें हैं। पक्षियों के शरीर में प्रोटीन निर्माण के लिए लायसिन, मिथायोनाइन, थ्रिओनाइन और ट्रिप्टोफैन जैसे अमीनो एसिड्स अनिवार्य होते हैं। इसके अलावा मिनरल मिक्सचर, विटामिन A, D3, E, B-कॉम्प्लेक्स, प्रोबायोटिक्स और फाइटेज जैसे एंजाइम का उपयोग फीड की गुणवत्ता सुधारने के लिए किया जाता है।

इन सभी घटकों की आपूर्ति बड़े पैमाने पर आयात (Import) पर निर्भर है। युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति बाधित होने से इनके दामों में तेजी से उछाल आया है। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में इन घटकों की कीमतें बढ़ने से पोल्ट्री फीड की लागत में कम से कम 10% की वृद्धि हुई है।
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अंडों के निर्यात पर असर, कीमतों में गिरावट
इसी दौरान मध्य-पूर्व (Middle East) की स्थिति के कारण अंडों के निर्यात पर भी बुरा असर पड़ा है। सऊदी अरब ने खाद्य सुरक्षा कारणों से 40 देशों से पोल्ट्री मांस और अंडों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही युद्ध के कारण बंदरगाहों और हवाई मार्गों पर पाबंदियां आने से निर्यात लगभग ठप हो गया है।

तमिलनाडु का नमक्कल, जो भारत में अंडा उत्पादन और निर्यात का प्रमुख केंद्र है, वहां के निर्यातकों को भारी नुकसान हुआ है। विदेशी बाजारों में बिक्री रुकने से अंडों का स्टॉक बढ़ गया है, जिसे अब घरेलू बाजार में कम दामों पर बेचना पड़ रहा है।

वर्तमान में एक अंडे की उत्पादन लागत लगभग ₹4.50 है, जबकि बिक्री दर गिरकर ₹3.50 तक पहुंच गई है। निर्यातकों का अनुमान है कि इस अंतर के कारण रोजाना लगभग ₹5 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
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उद्योग के सामने कठिन परिस्थिति
फीड की बढ़ती लागत और अंडों के दामों में गिरावट के इस दोहरे प्रहार ने लेयर पोल्ट्री किसानों को गंभीर आर्थिक संकट में डाल दिया है। विशेष रूप से, देश के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में पिछले 15 दिनों में फीड की 50 किलो वाली बोरी पर ₹150 से ₹200 तक की वृद्धि हुई है, जिसका असर अब देशभर में दिख रहा है।

“मेक इन इंडिया” के लिए बड़ा अवसर
पोल्ट्री क्षेत्र के युवा शोधकर्ता ललित लांजेवार के अनुसार, “इस संकट ने भारत के सामने एक बड़ा अवसर भी पैदा किया है। अमीनो एसिड्स और फीड-ग्रेड इनपुट्स (पशु आहार घटक) के घरेलू उत्पादन पर जोर देने का यह सही समय है।”

वर्तमान में भारत लायसिन, मिथायोनाइन और थ्रिओनाइन जैसे घटकों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है। लेकिन भारत में मोलासेस (गुड़ का उप-उत्पाद) प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के कारण 'फर्मेंटेशन' (किण्वन) आधारित उद्योग लगाने की अपार संभावनाएं हैं।

इस क्षेत्र में निवेश करने से:
आयात पर निर्भरता कम होगी।
विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
पशु आहार और दवा उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिलेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

आगे की राह
वर्तमान वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए भारत के लिए अपनी 'फीड सुरक्षा' को मजबूत करना अनिवार्य हो गया है। यदि भारत अमीनो एसिड उत्पादन में आत्मनिर्भर बनता है, तो वह न केवल अपनी जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि एक बड़े निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है। लांजेवार बताते हैं कि भले ही फीड के दाम बढ़े हैं, लेकिन चिकन की कीमतें फिलहाल स्थिर हैं। कुल मिलाकर, वैश्विक संघर्ष का भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ रहा है और इस संकट से निपटने के लिए तत्काल रणनीतिक फैसलों की आवश्यकता है।
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