नागपुर (ललित लांजेवार)
देशभर में भीषण गर्मी, लगातार बढ़ते तापमान, बिजली कटौती, डीजल संकट और अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण भारतीय पोल्ट्री उद्योग एक गंभीर संकट की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। देश के कई राज्यों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। ऐसे हालात में पोल्ट्री फार्मों को चालू रखना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
पोल्ट्री उद्योग से जुड़े किसानों, इंटीग्रेटर कंपनियों, फीड निर्माताओं, दवा कंपनियों, ट्रांसपोर्ट सेक्टर और कच्चे माल के व्यापारियों पर इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में बिजली, ईंधन और कच्चे माल की आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ, तो देश में चिकन और अंडा उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
ओडिशा की घटना ने बढ़ाई देशभर के फार्मरों की चिंता
हाल ही में ओडिशा के मलकानगिरी जिले में एक पोल्ट्री फार्म में बिजली बंद होने के कारण लगभग 5300 से अधिक मुर्गियों की मौत ने पूरे देश के पोल्ट्री उद्योग को झकझोर दिया है। जानकारी के अनुसार फार्म में अचानक बिजली सप्लाई बाधित हुई, जिससे कूलिंग पैड, एग्जॉस्ट फैन, वेंटिलेशन सिस्टम और पानी की आपूर्ति ठप हो गई।
भीषण गर्मी के कारण फार्म के अंदर तापमान तेजी से बढ़ा और महज कुछ घंटों के भीतर हजारों पक्षियों की दम घुटने और हीट स्ट्रेस के कारण मौत हो गई। बताया जा रहा है कि जनरेटर चलाने के लिए पर्याप्त डीजल की उपलब्धता नहीं हो सकी, जिससे हालात और बिगड़ गए।
यह घटना केवल एक राज्य तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे देशभर के पोल्ट्री उद्योग के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
गर्मी में पोल्ट्री फार्म बिजली पर पूरी तरह निर्भर
पोल्ट्री विशेषज्ञों के अनुसार गर्मी के मौसम में आधुनिक पोल्ट्री फार्म पूरी तरह बिजली आधारित सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। फार्म के अंदर तापमान नियंत्रित रखने के लिए लगातार कूलिंग पैड, हाई स्पीड एग्जॉस्ट फैन, फॉगिंग सिस्टम, टनल वेंटिलेशन, ड्रिंकिंग सिस्टम और ऑटोमेटिक फीड सिस्टम को लगातार चालू रखना जरूरी होता है।
गर्मी के मौसम में मुर्गियां सामान्य तापमान की तुलना में अधिक तनाव (Heat Stress) में रहती हैं। यदि 10–15 मिनट के लिए भी वेंटिलेशन बंद हो जाए, तो पक्षियों में सांस लेने में दिक्कत शुरू हो जाती है। कई बार कुछ घंटों में हजारों पक्षियों की मृत्यु हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में यदि बिजली कटौती बढ़ती है, तो देशभर के ब्रॉयलर, लेयर, ब्रीडर और हैचरी फार्मों पर बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है।
देश में डीजल संकट ने बढ़ाई चिंता
देश के कई हिस्सों में पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ रही है। कई स्थानों पर किसानों और पोल्ट्री संचालकों को ड्रम, कैन या डिब्बों में डीजल देने से मना किया जा रहा है। इससे पोल्ट्री फार्मों में लगे जनरेटर चलाना कठिन होता जा रहा है।
पोल्ट्री किसानों का कहना है कि गर्मी के समय जनरेटर ही जीवन रक्षक व्यवस्था होती है। बिजली कटते ही फार्म बचाने का एकमात्र सहारा डीजल जनरेटर होता है। लेकिन यदि डीजल की उपलब्धता प्रभावित हुई, तो फार्मों को बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
डीजल कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से फार्म संचालन की लागत पहले ही काफी बढ़ चुकी है। ट्रांसपोर्ट खर्च, फीड डिलीवरी, लाइव बर्ड ट्रांसपोर्ट, चूजा सप्लाई, दवा वितरण और फार्म संचालन सब महंगे होते जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा असर भारतीय पोल्ट्री पर
पोल्ट्री व्यापारियों और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान-अमेरिका-इजराइल क्षेत्र में बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया की अस्थिरता का सीधा असर भारतीय पोल्ट्री उद्योग पर पड़ रहा है।
विशेष रूप से ईरान और ओमान के बीच स्थित महत्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से कच्चे तेल की सप्लाई पर निर्भर है। यदि यहां तनाव बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
इसका असर भारत में डीजल, पेट्रोल, गैस, ट्रांसपोर्ट और औद्योगिक लागत पर सीधा दिखाई देगा, जिसका सबसे बड़ा प्रभाव पोल्ट्री सेक्टर जैसे ऊर्जा-आधारित उद्योगों पर पड़ेगा।
फीड इंडस्ट्री पर दोहरा संकट
पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियां पहले से ही भारी दबाव में हैं। सोया DOC, मक्का, तेल, अमीनो एसिड, विटामिन प्रीमिक्स, मिनरल्स, फीड एडिटिव्स, पैकेजिंग सामग्री और प्लास्टिक दाना जैसी कई जरूरी वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।
फीड उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव, डॉलर की अस्थिरता, आयात लागत और लॉजिस्टिक खर्च बढ़ने के कारण कच्चा माल महंगा होता जा रहा है।
इसके कारण फीड कंपनियों को बार-बार रेट बढ़ाने पड़ रहे हैं, जिससे किसानों और डीलरों के बीच तनाव भी बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में किसान महंगा फीड खरीदने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, जबकि कंपनियों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण उनके मार्जिन लगातार घट रहे हैं और घाटा बढ़ रहा है।
अमायनो ऍसिड दवा, विटामिन और सप्लीमेंट भी महंगे
पोल्ट्री सेक्टर में उपयोग होने वाली कई दवाइयां, विटामिन, लिवर टॉनिक, प्रोबायोटिक्स, एंटीऑक्सीडेंट, इलेक्ट्रोलाइट्स और इम्यूनिटी बूस्टर उत्पाद भी महंगे हो रहे हैं।
कई उत्पादों में उपयोग होने वाला कच्चा माल विदेशों से आता है। सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण बाजार में उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो रही हैं। इसका सबसे अधिक असर छोटे और मध्यम पोल्ट्री किसानों पर पड़ रहा है, जिनके लिए पहले ही उत्पादन लागत निकालना मुश्किल हो गया है।
लागत बढ़ी लेकिन चिकन और अंडे के दाम स्थिर
पोल्ट्री विश्लेषक ललित लांजेवार का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में डीजल, बिजली, फीड, दवाइयां, ट्रांसपोर्ट, मजदूरी और फार्म मेंटेनेंस की लागत तेजी से बढ़ी है। गर्मी के कारण कूलिंग सिस्टम पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
लेकिन दूसरी ओर बाजार में चिकन और अंडों के दाम उत्पादन लागत के अनुपात में नहीं बढ़े हैं। इससे किसानों का मार्जिन लगातार घट रहा है और कई छोटे फार्म आर्थिक संकट में पहुंच चुके हैं।
देश के कई राज्यों में छोटे पोल्ट्री किसान घाटे में व्यवसाय चला रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले महीनों में हजारों छोटे फार्म बंद होने का खतरा बढ़ सकता है।
इंटीग्रेशन कंपनियां और सप्लाई चेन भी प्रभावित
बढ़ते ईंधन संकट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। बड़ी इंटीग्रेशन कंपनियां, हैचरियां, फीड मिलें, प्रोसेसिंग यूनिट, लाइव बर्ड मार्केट और चिकन वितरण नेटवर्क भी प्रभावित हो सकते हैं।
ट्रक और मालवाहक वाहनों के संचालन में रुकावट आने से चूजा सप्लाई, फीड सप्लाई, लाइव बर्ड मूवमेंट और तैयार चिकन वितरण प्रभावित हो सकता है। यदि स्थिति गंभीर हुई, तो बाजार में चिकन और अंडों की उपलब्धता कम हो सकती है और उपभोक्ता कीमतों में अचानक उछाल भी देखने को मिल सकता है।
आने वाले समय में बड़ा संकट?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गर्मी, बिजली संकट, ईंधन आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय तनाव की स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो भारतीय पोल्ट्री उद्योग को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में चिकन और अंडों की उपलब्धता, कीमत और संपूर्ण सप्लाई चेन पर दिखाई देगा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े पोल्ट्री उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में पोल्ट्री उद्योग को बचाने के लिए समय रहते नीतिगत निर्णय लेना बेहद जरूरी माना जा रहा है।





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