ललित लांजेवार/नागपुर:
देश के कृषि और पशुपालन क्षेत्र से जुड़े दो सबसे बड़े उद्योगों के बीच इस समय सोयाबीन मील (Soyameal) के आयात को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक तरफ सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) ने सरकार को चिट्ठी लिखकर आयात की मांग को तुरंत खारिज करने की अपील की है, तो दूसरी तरफ पोल्ट्री उद्योग के शीर्ष संगठन (CLFMA) ने घरेलू बाजार में दाने की भारी किल्लत और बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए तुरंत 15 लाख टन सोया मील आयात करने की गुहार लगाई है।
इस खींचतान ने सरकार के सामने नीतिगत (Policy) संकट खड़ा कर दिया है, क्योंकि दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए मांग के आंकड़ों में 28 लाख टन (करीब 43%) का भारी अंतर है।
आंकड़ों का मायाजाल: 90 लाख टन बनाम 62 लाख टन
इस पूरे विवाद की जड़ में सोया मील की सालाना घरेलू मांग के अनुमान हैं, CLFMA के अध्यक्ष दिव्यकुमार गुलाठी का दावा है की पोल्ट्री और पशु आहार के लिए सालाना 90 लाख टन से अधिक सोया मील की जरूरत है।
दुसरी तरफ सोपा (SOPA) के एक्झिक्युटिव्ह डायरेक्टर का D.N. पाठक कहते है देश की वास्तविक मांग मात्र 62 लाख टन के आसपास ही है।
सोपा के प्रतिनिधि पाठक का कहना है कि पोल्ट्री उद्योग पिछले कई वर्षों से लगातार एक ही आंकड़ा (90 लाख टन) दे रहा है, जबकि इस दौरान पोल्ट्री सेक्टर में सालाना 6 से 8% की ग्रोथ दर्ज की गई है। सोपा ने सरकार से मांग की है कि किसी इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट (स्वतंत्र विशेषज्ञ) से इन आंकड़ों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
आयात खुला तो बर्बाद हो जाएगा देश का सोयाबीन किसान-D.N पाठक
सोपा ने सरकार को भेजी चिट्ठी में जीएम (Genetically Modified) सोया मील के आयात का कड़ा विरोध किया है।
विदेशी बाजारों से असमान मुकाबला: अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में बड़े-बड़े यंत्रीकृत (Mechanized) और सिंचित फार्मों में खेती होती है। वहां से जीएम सोया मील भारत के बंदरगाहों पर करीब ₹45,000 प्रति टन की कम कीमत पर पहुंच सकता है।
एमएसपी पर खतरा: भारत सरकार ने सोयाबीन की एमएसपी (MSP) तय की है, जिसके मुताबिक मंडी में किसानों को कम से कम ₹7,000 प्रति क्विंटल (₹70,000 प्रति टन) का भाव मिलना चाहिए। अगर ₹45,000 का विदेशी माल बाजार में आ गया, तो भारतीय किसानों से कोई सोयाबीन नहीं खरीदेगा।
विदेशी मुद्रा का नुकसान: पाठक का कहना है कि भारत पहले ही सालाना ₹2 लाख करोड़ का खाद्य तेल आयात करता है। सोया मील का आयात शुरू होने से देश पर 1 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
मार्केट सेंटीमेंट का खेल: सोपा का दावा है कि देश में सोयाबीन की कोई भौतिक कमी नहीं है, बल्कि अल-नीनो (El Nino) के डर और बाजार के सेंटीमेंट के कारण किसानों और व्यापारियों ने स्टॉक होल्ड किया था, जिससे दाम बढ़े। जब सरकारी एजेंसी नाफेड (NAFED) खुद ₹5,300 में खरीदा माल ₹7,000 से ऊपर की कीमतों पर बेच रही है, तो निजी उद्योग को दोष देना गलत है।
पोल्ट्री उद्योग (CLFMA) की मांग:
"पोल्ट्री किसान को बचाने के लिए 15 लाख टन आयात जरूरी"
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने सोपा के दावों को खारिज करते हुए कहा कि पोल्ट्री किसान इस समय लागत के भारी बोझ के नीचे दबा हुआ है।
घरेलू बाजार में 10 लाख टन की शॉर्टेज: उद्योग का गणित है कि कुल 93-94 लाख टन सोया मील की जरूरत के मुकाबले इस सीजन में क्रशिंग से केवल 83 लाख टन माल ही बाहर आया है। बाजार में सीधे तौर पर 10 लाख टन की कमी है, जिसके कारण दाम आसमान छू रहे हैं।
उत्पादन लागत में भारी उछाल: इस समय अंडों की उत्पादन लागत ₹5 से ₹6 और ब्रायलर चिकन की लागत ₹105 से ₹110 प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। दाने के दाम बढ़ने से पोल्ट्री किसान भारी घाटा उठाने को मजबूर हैं।
विकल्पों की कमी: पोल्ट्री फीड (खासकर ब्रायलर) में सोया मील की जगह डीडीजीएस (DDGS) जैसे सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनमें अफलाटॉक्सिन (Aflatoxin) नाम का हानिकारक तत्व होता है, जो पक्षियों की सेहत के लिए खतरनाक है।
अस्थायी राहत की मांग (Stop-gap Arrangement): पोल्ट्री उद्योग का कहना है कि वे हमेशा के लिए आयात नहीं मांग रहे। वे केवल अक्टूबर में आने वाली नई खरीफ फसल तक के लिए टीआरक्यू (Tariff Rate Quota) के तहत 15 लाख टन आयात की सीमित मंजूरी चाहते हैं, जैसा कि सरकार ने साल 2021 में भी कीमतें नियंत्रित करने के लिए किया था।
ब्यूरोक्रेट्स के सामने असमंजस: क्या होगा बीच का रास्ता?
इस समय सरकार के नीति निर्धारकों (Policy Makers) के सामने एक तरफ देश का सोयाबीन उत्पादक किसान है, जिसकी उपज का सही दाम दिलाना सरकार की प्राथमिकता है। दूसरी तरफ देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा पोल्ट्री और पशुपालक किसान है, जिसे सस्ते चारे की दरकार है।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस मामले में बीच का रास्ता निकाल सकती है। नई फसल आने में अभी कुछ महीनों का समय है, ऐसे में पोल्ट्री उद्योग को राहत देने के लिए एक निश्चित समय सीमा और सख्त कोटे (टीआरक्यू) के तहत सीमित आयात की अनुमति दी जा सकती है, जिससे घरेलू सोयाबीन उत्पादकों के हितों पर भी आंच न आए। फिलहाल, सभी की नजरें उपभोक्ता मामलों और कृषि मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हैं।

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